जीवन परिचय biography

Monday, 31 May 2021

स्वामी दयानन्द सरस्वती | दयानन्द सरस्वती की जीवनी

May 31, 2021 0
स्वामी दयानन्द सरस्वती | दयानन्द सरस्वती की जीवनी

स्वामी दयानन्द सरस्वती


एक ऐसी घटना जिसने दयानन्द के जीवन का पूरा क्रम ही बदल डाला। वह घटना कुछ इस प्रकार है...
शिवरात्रि का पर्व है। गाँव की सीमा पर स्थित शिवालय में आज भक्तों की बहुत भीड़ है। दीपकों के प्रकाश से सारा देवालय जगमगा रहा है। भक्तों की मण्डली भाव-विभोर होकर भजन में मग्न है। लोगों का विश्वास है कि आज दिन भर निराहार रहकर रात्रि जागरण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
कुछ समय तक भजन-कीर्तन का क्रम चलता रहा परन्तु जैसे-जैसे रात्रि बीतने लगी लोगों का उत्साह ठंडा पड़ने लगा। कुछ उठकर अपने घरों को चले गए, जो रह गए वे भी अपने आपको सँभाल न सके। आधी रात होते-होते वहीं सो गए। ढोल-मंजीरे शान्त हो गए।
 निस्तब्ध सन्नाटे में एक बालक अभी भी जाग रहा था। उसकी आँखों में नींद कहाँ अपलक दृष्टि से वे अब भी शिव-प्रतिमा को निहार रहा था। तभी उसकी दृष्टि एक चूहे पर पड़ी जो बड़ी सतर्कतापूर्वक इधर-उधर देखते हुए शिवलिंग की ओर बढ़ रहा था। शिवलिंग के पास पहुँचकर पहले तो वह उस पर चढ़ायी गयी भोग की वस्तुओं को खाता रहा, फिर सहसा मूर्ति के ऊपर चढ़कर आनन्दपूर्वक घूमने लगा जैसे हिमालय की चोटी पर पहुँच जाने का गौरव प्राप्त हो गया हो।
पहले तो बालक का मन हुआ कि यह चूहे को डराकर दूर भगा दे परन्तु दूसरे ही क्षण उनके अन्तर्मन को एक झटका सा लगा, श्रद्धा और विश्वास के सारे तार झनझनाकर जैसे एक साथ टूट गए। इस विचार ने बालक के जीवन दर्शन को ही बदल डाला। उसने ईश्वर की खोज का संकल्प लिया। यह बालक था मूलशंकर। आगे चलकर यही बालक महर्षि दयानन्द सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जन्म 12 फरवरी सन् 1824 ई०
जन्म स्थान अजमेर, राजस्थान
गुरु विरजानंद दंडिश
पिता कर्षन त्रिवेदी
प्रमुख रचनाएं सत्यार्थ प्रकाश
मृत्यु 30 अक्टूबर 1983

 

मूलशंकर (महर्षि दयानन्द) के पिता का नाम कर्षन जी त्रिवेदी और माता का नाम शोभाबाई था। महर्षि दयानन्द के पिता की इच्छा थी कि उनका पुत्र पढ़-लिखकर सद्गृहस्थ बने और जमींदारी तथा लेन-देन में उनकी मदद करे। परन्तु मूलशंकर का मन अध्ययन और एकान्त चिन्तन में लगता था। मूलशंकर की प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत में हुई।

कुशाग्र बुद्धि तथा विलक्षण स्मरण शक्ति के कारण थोड़े ही दिनों में दयानंद को संस्कृत के बहुत से स्तोत्र-मन्त्र और श्लोक याद हो गए। 
जब महर्षि दयानन्द सोलह वर्ष के थे तभी उनके जीवन में दो ऐसी घटनाएँ घटी जिसने मूलशंकर के मन में वैराग्य-भावना को दृढ़ बना दिया। उनकी छोटी बहन की हैजा से मृत्यु हो गई। मूलशंकर डबडबायी आँखों से अपनी प्यारी बहन को मृत्यु के मुँह में जाते असहाय देखते रहे। उन्हें लगा कि जीवन कितना निरुपाय है ! संसार कितना मिथ्या !
तीन वर्ष पश्चात सन् 1843 में मूलशंकर के चाचा की मृत्यु हो गई। मूलशंकर को चाचा से अपार स्नेह था परन्तु मृत्यु ने आज उनके इस स्नेह-बन्धन को भी तोड़ दिया। संसार की निस्सारता ने एक बार फिर उन्हें झकझोर दिया। वैराग्य का नन्हा पौधा बढ़कर एक विशाल वृक्ष बन गया।

उन्होंने उसी समय दृढ़ संकल्प किया मैं घर-गृहस्थी के बन्धन में नहीं पढूँगा और एक दिन मूलशंकर घर के सभी लोगों की दृष्टि बचाकर चुपचाप घर से निकल पड़े। इस समय उनकी अवस्था मात्र 21 वर्ष की थी। 
चलते-चलते कई दिनों के बाद वे सायले (अहमदाबाद) गाँव में पहुंचे। वहाँ उन्होंने एक ब्रह्मचारी जी से दीक्षा ग्रहण की और अब वे मूलशंकर से शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी बन गये। कुछ दिन यहाँ रह कर वे साधुओं से योग क्रियाएँ सीखते रहे किन्तु अनन्त सत्य की खोज में निकले शुद्ध चैतन्य का मन सायले ग्राम में बंधकर न रह सका। युवा संन्यासी की ज्ञान पिपासा उन्हें नर्मदा के किनारे-किनारे दूर तक ले गयी। 

एक दिन उनकी भेंट दण्डी स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से हुई। वे बहुत विद्वान एवं उच्च कोटि के संन्यासी थे। शुद्ध चैतन्य ब्रह्मचारी उनके पास पहुँच गये और उनसे संन्यास की दीक्षा देने का अनुरोध किया। पहले तो गुरु ने अपने शिष्य की युवावस्था को देखते हुए संन्यास की दीक्षा देने से इनकार किया किन्तु दूसरे ही क्षण उन्होंने शुदध चैतन्य ब्रह्मचारी की आँखों में झाँककर उनकी वैराग्य भावना को पहचान लिया। उन्होंने विधिवत् उन्हें संन्यास की दीक्षा दी। अब मूलशंकर शुद्ध चैतन्य ब्रहाचारी से सन्यासी बनकर दयानन्द सरस्वती हो गये।
दीक्षा के उपरान्त स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपना सारा समय विद्याध्ययन और योगाभ्यास में लगाया।
अहंकार को त्यागकर शिष्य भाव से उन्हें जिससे जो कुछ भी प्राप्त हुआ उसे बड़ी कृतज्ञता से ग्रहण किया।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने द्वारिका के स्वामी महात्मा शिवानन्द से योग विद्या का ज्ञान प्राप्त किया।

मथुरा के स्वामी विरजानन्द के विमल यश और पाण्डित्य की चर्चा सुनकर वे मथुरा जा पहुँचे। स्वामी विरजानन्द के चरणों में बैठकर दयानन्द ने "अष्टाध्यायी महाभाष्य", "वेदान्त सूत्र" आदि अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। जब वे पढ़ने बैठते तो तर्कयुक्त प्रश्नों की झड़ी लगा देते थे। उनकी लगन और निष्ठा से प्रभावित होकर गुरु विरजानन्द ने कहा- 
दयानन्द! आज तक मैंने सैकड़ों विद्यार्थियों को पढ़ाया पर जैसा आनन्द और जो उत्साह मुझे तुम्हें पढ़ाने में मिलता है वह कभी नहीं मिला। तुम्हारी तर्कशक्ति, अप्रतिम और स्मरणशक्ति अलौकिक है।
तुम्हारी योग्यता, तुम्हारी प्रतिभा का लाभ देश के जन को मिले यही मेरी आकांक्षा और शुभकामना है।

स्वामी दयानन्द ने गुरु की इस आकांक्षा को जीवन भर गाँत बाँधकर रखा। उन्हें गुरु के वे आदेश वाक्य भी प्रतिक्षण सुनायी देते रहे जो उन्होंने विद्याध्ययन की समाप्ति पर उन्हें अपने आश्रम से विदा करते समय कहे थे। उनका आदेश था- वत्स दयानन्द ! संसार से भागकर जंगलों में जाकर एकान्त साधना करने में सन्यास की पूर्णता नहीं है। संसार के बीच रह कर दीन-दुखियों की सेवा करना, अशान्त जीवन में शान्ति।
का विस्तार करते हुए दोष मुक्त जीवन को बिताना ही सच्ची साधु प्रवृत्ति हैं। जाओ, समाज के बीच रहकर अनेक कुसंस्कारों और अंधविश्वासों से खण्ड-खण्ड हो रहे समाज का उद्धार करो, उसे नयी चेतना दो, नया जीवन दो।

स्वामी दयानन्द ने आडम्बरों का जीवन भर विरोध किया। इस संदर्भ में उन्होंने एक महान धर्मग्रन्थ 'सत्यार्थ प्रकाश' लिखा। जिसमें धर्म, समाज, राजनीति, नैतिकता एवं शिक्षा पर उनके संक्षिप्त विचार दिये गये हैं। स्वामी दयानन्द के दृष्टिकोण एवं जीवन दर्शन को संक्षेप में इस उद्धरण से समझा जा सकता हैं-
कोई भी सद्गुण सत्य से बड़ा नहीं है। कोई भी पाप झूठ से अधम नहीं है। कोई ज्ञान भी सत्य से बड़ा नहीं है इसलिए मनुष्य को सदा सत्य का पालन करना चाहिए।

धर्म के नाम पर मानव समाज का भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में बँटा होना उन्हें ईश्वरीय नियम के प्रतिकूल लगता था। लोगों को उपदेश देते हुए प्रायः कहा करते थे -

परमात्मा के रचे पदार्थ सब प्राणी के लिए एक से हैं। सूर्य और चन्द्रमा सब के लिए समान प्रकाश देते हैं। वायु और जल आदि वस्तुएँ सबको एक सी ही दी गयी हैं। जैसे ये पदार्थ ईश्वर की ओर से सब प्राणियों के लिए एक से हैं और समान रूप से लाभ पहुँचाते हैं वैसे ही परमेश्वर प्रदत्त धर्म भी सब मनुष्यों के लिए एक ही होना चाहिए।

भारतीय समाज को वेद के आदर्शों के अनुरूप लाने एवं भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने हेतु उन्होंने 1875 में "आर्य समाज" की मुम्बई में स्थापना की। आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य सभी मनुष्यों के शारीरिक, आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर को ऊपर उठाना था।
स्वामी दयानन्द सरस्वती प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने वेदों और संस्कृत साहित्य के अध्ययन पर बल दिया। तत्कालीन समाज में महिलाओं की गिरती हुई स्थिति का  कारण उन्हें उनका अशिक्षित होना लगा। फलतः उन्होंने नारी शिक्षा पर विशेष बल दिया।
स्वामी दयानन्द ने पर्दा प्रथा तथा बाल विवाह जैसी कुरीतियों का घोर विरोध किया। उन्होंने विधवा  विवाह और पुनर्विवाह की प्रथा का समर्थन किया। समाज में व्याप्त वर्ण-भेद, असमानता और छुआ-छूत की भावना का भी खुलकर विरोध करते हुए कहा -
"जन्म से मनुष्य किसी जाति विशेष का नहीं होता बल्कि कर्म के आधार पर होता है।"
स्वामी दयानन्द ने हिन्दी भाषा को राज भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का पूरा प्रयास किया। यद्यपि वे संस्कृत के विद्वान थे किन्तु उन्होंने हिन्दी में पुस्तकें लिखीं। संस्कृत भाषा और धर्म को ऊँचा स्थान दिलाने के लिए उन्होंने हिन्दी भाषा को प्रतिष्ठित किया।

कोई चाहे कुछ भी करे, देशी राज्य ही सर्वश्रेष्ठ है। विदेशी सरकार सम्पूर्ण रूप से लाभकारी नहीं हो सकती, फिर चाहे वे धार्मिक पूर्वाग्रह और जातीय पक्षपात से मुक्त तथा पैतृक न्याय और दया से अनुप्राणित ही क्यों न हो।

            -दयानन्द सरस्वती (सत्यार्थप्रकाश)

स्वामी दयानन्द समाज सुधारक और आर्य संस्कृति के रक्षक थे। मनुष्य मात्र के कल्याण की कामना करने वाले महर्षि दयानन्द का जीवनदीप सन् 1883 की कार्तिक अमावस्या को सहसा बुझ गया किन्तु उस दीपक का प्रकाश उनके कार्यों और विचारों के रूप में आज भी फैला है।

स्वामी दयानन्द के विषय में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था-

स्वामी दयानन्द सरस्वती 19 वीं शताब्दी में भारत के पुनर्जागरण के प्रेरक व्यक्ति थे। उन्होंने भारतीय समाज के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जिस पर चलकर भारतीय समाज समुन्नत किया जा सकता है।


Saturday, 29 May 2021

आदि गुरु शंकराचार्य की जीवनी | (अनमोल वचन )

May 29, 2021 0
आदि गुरु शंकराचार्य की जीवनी | (अनमोल वचन )

आदि गुरु शंकराचार्य: Aadi Guru Sankrachrya ki Jivani:


In this post... शंकराचार्य का जन्म, आदि शंकराचार्य के उपदेश, शंकराचार्य की मृत्यु कैसे हुई, आदि शंकराचार्य के स्लोक

"हे मानव ! तू स्वयं को पहचान, स्वयं को
पहचानने के बाद तू ईश्वर को पहचान जायेगा।"

                            ...आदि गुरु शंकराचार्य


शंकराचार्य का बचपन का नाम शंकर था।शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत के केरल प्रदेश में पूर्णा नदी के तट पर स्थित कालडी ग्राम में आज से लगभग बारह सौ वर्ष पहले हुआ था। इनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम आर्यम्बा था। इनके पिता बड़े विदवान थे तथा इनके पितामह भी वेद-शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान थे। इनका परिवार अपने पांडित्य के लिये विख्यात था।शंकराचार्य के मन में बचपन से ही संन्यासी बनने की प्रबल इच्छा थी।आदि गुरु अर्थात शंकराचार्य जी ऐसे महान सन्यासी थे जिन्होंने माँ की अनुमति के बाद सन्यास ग्रहण किया।

Aadi Guru Sankrachrya

शंकराचार्य बारे में ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी "आपका पुत्र महान विद्वान, यशस्वी तथा भाग्यशाली होगा इसका यश पूरे विश्व में फैलेगा और इसका नाम अनन्त काल तक अमर रहेगा।" पिता शिवगुरु यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने पुत्र का नाम शंकर रखा। ये अपने माँ-बाप की इकलौती सन्तान थे। शंकर तीन ही वर्ष के थे कि इनके पिता का देहान्त हो गया। पिता की मृत्यु के बाद माँ आर्यम्बा शंकर को घर पर ही पढ़ाती रही। पाँचवे वर्ष उपनयन संस्कार हो जाने पर माँ ने इन्हें आगे अध्ययन के लिए गुरु के पास भेज दिया।

शंकर कुशाग्र एवं अलौकिक बुद्धि के बालक थे। इनकी स्मरण शक्ति अदभुत थी। जो बात एक बार पढ़ लेते या सुन लेते उन्हें याद हो जाती थी। इनके गुरु भी इनकी प्रखर मेधा को देखकर आश्चर्यचकित थे। शकर कुछ ही दिनों में वेदशास्त्रों एवं अन्य धर्मग्रन्थों में पारंगत हो गये। शीघ्र ही इनकी गणना प्रथम कोटि के विद्वानों में होने लगी।

शंकर गुरुकुल में सहपाठियों के साथ भिक्षा माँगने जाते थे। वे एक बार कहीं भिक्षा माँगने गये। अत्यन्त विपन्नता के कारण गृहस्वामिनी भिक्षा न दे सकी अतः रोने लगी। शकर के हृदय पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा।
विद्या अध्ययन समाप्त कर शंकर घर वापस लौटे। घर पर दे विद्यार्थियों को पढ़ाते तथा माँ की सेवा करते थे। इनका ज्ञान और यश चारों तरफ फैलने लगा।

केरल के राजा ने इन्हें अपने दरबार का राजपुरोहित बनाना चाहा विन्तु इन्होंने बड़ी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। राजा स्वयं शंकर से मिलने आये।  उन्होंने एक हजार अशर्फियाँ इन्हें भेंट की और इन्हें तीन स्वरचित नाटक दिखाये। शंकर ने नाटकों की प्रशंसा की किन्तु अशर्फियाँ लेना अस्वीकार कर दिया। शंकर के त्याग एवं गुणग्राहिता के कारण राजा इनके भक्त बन गए।
अपनी माँ से अनुमति लेकर शंकर ने संन्यास ग्रहण कर लिया। माँ ने अनुमति देते समय शंकर से वचन लिया कि वे उनका अन्तिम संस्कार अपने हाथों से ही करेंगे। यह जानते हुए भी कि संन्यासी यह कार्य नहीं कर सकता उन्होंने माँ को वचन दे दिया। माँ से आज्ञा लेकर शंकर नर्मदा तट पर तप में लीन संन्यासी गोविन्दनाथ के पास पहुंचे। शंकर जिस समय वहाँ पहुँचे गोविन्दनाथ एक गुफा में समाधि लगाये बैठे थे । समाधि टूटने पर शंकर ने उन्हें प्रणाम किया और बोले –'मुझे संन्यास की दीक्षा तथा आत्मविद्या का उपदेश दीजिए

गोविन्दनाय ने इनका परिचय पूछा तथा इनकी बातचीत से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने सन्यास की दीक्षा दी और इनका नाम शंकराचार्य रखा। वहाँ कुछ दिन अध्ययन करने के बाद वे गुरु की अनुमति लेकर सत्य की खोज के लिए निकल पड़े। गुरु ने उन्हें पहले काशी जाने का सुझाव दिया।
शंकराचार्य काशी में एक दिन गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। मार्ग में एक चांडाल मिला। शकराचार्य में उसे मार्ग से हट जाने के लिए कहा। उस चांडाल ने विनर भाव से पूछा- 'महाराज! आप चांडाल किसे कहते हैं ? इस शरीर को या आत्मा को ? यदि शरीर को तो वह नश्वर है और जैसा अन्न-जल का आपका शरीर वैसा ही मेरा भी। यदि शरीर के भीतर की आत्मा को, तो वह सबको एक है, क्योंकि ब्रह्म  एक है। शंकराचार्य को उसकी बातों से सत्य का ज्ञान हुआ और उन्होंने उसे धन्यवाद दिया।

आदि शंकराचार्य के श्लोक

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं। गजेंद्रस्य कृतिं वसानं वरेण्यं।
जटाजूटमध्ये स्फुदगाड्डग्वारीम। महादेवमेकं स्मरामि स्मरामि ।                ...वेदसार सिवस्तवः

काशी में शकराचार्य का वहाँ के प्रकाण्ड विद्वान मंडन मिश्च से शास्त्रार्थ हुआ। यह शास्त्रार्थ कई दिन तक चला। मंडन मिश्र तथा उनकी पत्नी भारती का बारी-बारी से इनसे शास्त्रार्थ हुआ। पहले शंकराचार्य भारती से हार गए किन्तु पुनः शास्त्रार्थ होने पर वे जीते। मंडन मिश्र तथा उनकी पत्नी शंकराचार्य के शिष्य बन गये।

महान कर्मकाण्डी कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ करने के लिए वे प्रयागधाम गए। भट्ट बड़े-बडे विद्वानों को परास्त करने वाले दिग्विजयी विद्वान थे।
संन्यासी शकराचार्य विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते रहे। वे श्रृंगेरी में थे तभी माता की बीमारी का समाचार मिला। वह तुरन्त माँ के पास पहुँचे। वह इन्हें देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। कहते हैं कि इन्होंने माँ को भगवान विष्णु का दर्शन कराया और लोगों के विरोध करने पर भी माँ का दाह संस्कार किया।

शंकराचार्य के मठ

शकराचार्य ने धर्म की स्थापना के लिए सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। उन्होंने भग्न मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तथा नये मन्दिरों की स्थापना की। लोगों को राष्ट्रीयता के एक सूत्र में पिरोने के लिएउन्होंने भारत के चारों कोनों पर चार धामों (मठों) की स्थापना की।
इनके नाम हैं-
बदरीनाथद्वारिकापुरी, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम् 
ये चारों धाम आज भी विद्यमान हैं।

शंकराचार्य का सिद्धांत

"ब्रह्म सत्य है तथा जगत मिथ्या है" इसी मत का इन्होंने प्रचार किया।
शंकराचार्य बड़े ही उज्जवल चरित्र के व्यक्ति थे। वे सच्चे संन्यासी थे तथा उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। इन्होंने भाष्य, स्तोत्र तथा प्रकरण ग्रन्थ भी लिखे। 


आदि शंकराचार्य की मृत्यु कैसे हुई 

शंकराचार्य के मृत्यु के विषय मे कोई ठोस प्रमाण नही है परंतु लोगो का मानना है  की ३२ वर्ष की अवस्था में शंकराचार्य कैलाश पर्वत पर अंतिम बार देखे गए और यही इन्होंने समाधि ग्रहण की। 

शंकराचार्य का अन्तिम उपदेश था-


"हे मानव ! तू स्वयं को पहचान, स्वयं को
पहचानने के बाद तू ईश्वर को पहचान जायेगा।"


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Friday, 28 May 2021

Savarkar's biography Wikipedia, Vir savarkar

May 28, 2021 0
Savarkar's biography Wikipedia, Vir savarkar

Savarkar's biography, Vir savarkar born


Savarkar's biography



Full name VinayakDamodar
Savarkar
Born 28 May 1883

Born place

Nashik, Bhaglpur
Father Damodparant
Savarkar

BrotherGanesh Damodar Savarkar

Died26 february
1966


Veer Savarkar was born on 28 May 1883 in Nashik, Bhaglpur.  Savarkar's full name was Vinayak Damodar Savarkar.  Veer Savarkar was not only a freedom fighter but a politician, lawyer, social reformer.  His father's name was Damodparant Savarkar and mother's name was Radhabai. Savarka's parents died in childhood. He was strongly influenced by his elder brother  (Babararo).


Savarkar's biography


He was embellished with the vir  surname for his bravery and courage. He completed his graduation from 'Ferguson College', Pune. and completed his Bachelor’s Degree. He studied the law in England's "Gray's Law" College. Shyamji Krishna Verma was his good friend, he helped Savarkar to go to Inland. Savarkar inspired Indian students and formed "Free India Society" in 1857.

Tuesday, 18 May 2021

आचार्य विनोबा भावे के विचार, विनोबा भावे का योगदान

May 18, 2021 0
आचार्य विनोबा भावे के विचार, विनोबा भावे का योगदान

 आचार्य विनोबा भावे

समय-समय पर इस देश में ऐसे व्यक्ति जन्म लेते रहे हैं जिन्होंने अपनी विशिष्ट क्षमताओं से देश तथा समाज को एक नई दिशा दी है। ऐसे ही व्यक्ति थे आचार्य विनोबा भावे। उनके व्यक्तित्व में सन्त, आचार्य (शिक्षक) और साधक तीनों का समन्वय था।


आचार्य विनोबा भावे


विनोबा भावे जी का जन्म 11 सितम्बर 1865 को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले के गागोदा ग्राम में हुआ था। बचपन में विनोबा जी को घूमने का विशेष शौक था। वे अपने गाँव के आसपास की पहाड़ियों, खेतों, नदियों एवं अन्य ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया करते थे। वे पढ़ाई के दिनों में पाठ्यपुस्तकों के साथ -साथ आध्यात्मिक पुस्तकें भी पढ़ा करते थे। छोटी उम्र में ही उन्होंने तुकाराम गाथा, दासबोध ब्रह्मसूत्र, शंकर भाष्य और गीता का अनेक बार अध्ययन किया।

विनोबा जी को अनेक भाषाओं का ज्ञान था। वे उच्चकोटि के रचनाकार भी थे। उनकी प्रारम्भिक रचनाएं मराठी भाषा में हैं। बाद में उन्होंने हिन्दी, तमिल, संस्कृत और बंगला में अनेक पुस्तकों की रचना की।

 महात्मा गाँधी के आग्रह पर विनोबा साबरमती आश्रम चले आये। आश्रम में आकर वे खेती का काम करने लगे। वहाँ वे कई महीनों तक मौन रहकर कार्य करते रहे। इनके कार्यों से प्रभावित होकर गाँधीजी ने इन्हें प्रथम सत्याग्रही की संज्ञा दे डाली।

लोगों ने सोचा कि वे गूंगे हैं, पर थोड़े ही दिनों बाद वे उपनिषदों का नियमित वाचन करने लगे तथा खाली समय में संस्कृत पढ़ाने का काम भी देखने लगे। विनोबा जी के पास कक्षा-५ से लेकर ऊँची कक्षाओं तक के बच्चे पढ़ने आया करते थे। उनकी रोचक और प्रभावशाली शैली से बच्चे और शिक्षक दोनों ही प्रभावित थे। लोगों ने उनके गुणों से प्रभावित होकर उन्हें आचार्य कहना प्रारम्भ कर दिया। विनोबा जी में आलस्य लेशमात्र भी नहीं था। वे दृढ़संकल्पी और सच्चे कर्मयोगी थे।

आचार्य विनोबा भावे जी किसी पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे तभी एक बिच्छू ने उनके पैर में डंक मार दिया। दर्द असह्य था। बिच्छू के जहर से उनका पैर काला पड़ गया। पीड़ा बढ़ने पर उन्होंने चरखा मँगाया और एकाग्र होकर सूत कातने लगे। इस कार्य में वे इतने तन्मय हो गये कि उन्हें न तो बिच्छू के डंक मारने का ध्यान रहा और न ही पीड़ा का।

विनोबा जी के जीवन पर गीता के उपदेशों का गहरा प्रभाव था। सन् 1632 में धलिया जेल में रहकर उन्होंने गीता पर 18 प्रवचन दिये जो आज 'गीता प्रवचन' के नाम से प्रसिदध हैं। वे हर समय चिन्तन-मनन में लीन रहते थे। लोगों की सेवा करना उनका धर्म बन गया था।

गाँधी जी के निधन के बाद विनोबा लगभग चौदह वर्ष तक देश के अनेक हिस्सों में घूमते रहे और भूदान आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करते रहे। जगह-जगह प्रार्थना सभाएं आयोजित कर इस सम्बन्ध में व्यक्तिगत और सामाजिक उत्थान के बारे में अपने विचार व्यक्त करते रहे। उनकी बात बहुत संक्षिप्त, संयत और सटीक होती थी। विनोबा जी कहने की अपेक्षा करने में अधिक विश्वास करते थे। वे पुरानी बातों को नये तालमेल के साथ इस तरह प्रस्तुत करते थे कि लोगों को स्वाभाविक रूप से जीवन की एक नई दिशा मिलती थी। विनोबा जी गाँधी, तिलक, तुकाराम, तुलसीदास, मीरा, रामकृष्ण और बुद्ध के जीवन से बहुत प्रभावित थे।

भूमिदान-

जिस घर में उद्योग की शिक्षा नहीं है उस समय विनोबा जी देश के कोने-कोने में स्थित गाँवों तक जाते थे और वहाँ ज्यादा भूमि वाले किसानों से मिलकर उनकी भूमि का कुछ हिस्सा भूमिहिनों के लिए माँगते थे। इस तरह भूदान यज्ञ के जरिये देश के अनेक भूमिहीन लोगों को विनोबा जी ने जमीन दिलायी

सर्वोदय सिद्धान्त-  

 विनोबा जी के सर्वोदय सिद्धान्त के तीन तत्व हैं - सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह (त्याग)। उनका कहना था कि आध्यात्मिक विकास का आधार सत्य है। सामाजिक विकास का आधार अहिंसा और आर्थिक हों विकास का आधार अपरिग्रह है। वे सर्वोदय का उद्देश्य स्वशासन और स्वावलम्बन मानते थे । 

विचारों का प्रभाव- 

उन दिनों चम्बल की घाटी में डाकुओं का बहुत आतंक था। विनोबा जी चम्बल घाटी के कनेरा गाँव गये। वहाँ उन्होंने लोगों को सम्बोधित किया। उनके विचारों से प्रभावित होकर चम्बल घाटी के उन्नीस डाकुओं ने एक साथ आत्मसमर्पण किया।

आचार्य विनोबा भावे ने जीवन के कई पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। वे जहाँ-तहाँ आयोजित प्रार्थना सभाओं, गोष्ठियों में प्रवचन दिया करते थे। यहाँ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर उनके विचार संक्षेप में दिये जा रहे हैं -

समता-

"समता का मतलब क्या है? बराबरी, कैसी बराबरी ? घर में चार रोटियाँ हैं और दो खाने वाले, हर एक को कितनी रोटियाँ दी जाएँ - दो-दो। ऐसी समता अगर माताएँ सीख लें तो अनर्थ हो जायेगा। गणित की समता दैनिक व्यवहार के किसी काम की नहीं। यदि इनमें से एक खाने वाला 2 साल का और दूसर 24 साल, तो एक अतिसार से मरेगा ओर दूसरा भूख से। समता का अर्थ है योग्यता के अनुसार कीमत आँकना।"

उद्योग-

अपने देश में आलस्य का भारी वातावरण है। यह आलस्य बेकारी के कारण आया है। शिक्षितों का तो उद्योग से कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता। जो खाता है उसे उद्योग तो करना ही चाहिए चाहे वह जिस

तरह का हो। घरों में उद्योग का वातावरण होना चाहिए। आलस्य की वजह से ही हम दरिद्र हो गये हैं,

परतंत्र हो गए हैं।

भक्ति-

"भक्ति के माने ढोंग नहीं है। हमें उद्योग छोड़कर झूठी भक्ति नहीं करनी है। खाली समय में भगवान का स्मरण कर लो। दिन भर पाप करके, झूठ बोलकर, प्रार्थना नहीं होती।"

सीखना-सिखाना-

'जिसे जो आता है वह उसे दूसरे को सिखाये और जो सीख सके, उसे खुद सीखे। केवल पाठशाला की शिक्षा पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।'

तालमेल-

"कहा जाता है कि वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में गाय और बाघ एक झरने पर पानी पीते थे। इसका अर्थ क्या हुआ ? बाघ की न केवल क्रूरता नष्ट होती थी बल्कि गाय की भीरुता भी नष्ट हो जाती थी। मतलब इस तरह मेल बैठता है। नहीं तो शेर को गाय बनाने का सामर्थ्य तो सर्कस वालों में भी है।"

एक आदर्श व्यक्तित्व-

विनोबा जी ने अपना सारा जीवन एक साधक की तरह बिताया। वे ऋषि, गुरु तथा क्रांतिदूत सभी कुछ थे। उनका व्यक्तित्व कुछ ऐसा तेजस्वी एवं प्रभावशाली था कि कोई भी व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। अद्भुत व्यक्तित्व के प्रकाश-पुरुष आचार्य विनोबा का निधन 14 नवम्बर 1682 को हो गया। लेकिन अपने विचारों के साथ वे सदैव हमारे बीच हैं, रहेंगे। वर्ष 1683 में इन्हें भारत सरकार के द्वारा मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

Thursday, 13 May 2021

गुरु गोविंद सिंह की जीवनी, गुरु गोविंद की वाणी

May 13, 2021 0
गुरु गोविंद सिंह की जीवनी, गुरु गोविंद की वाणी

        गुरु गोविन्द सिंह

समय-समय पर इस धरती पर कुछ ऐसी विभूतियाँ जन्म लेती रही हैं, जिनके विचारों से हम सभी का जीवन प्रकाशित होता है। ऐसी ही महान विभूतियों में गुरु गोविन्द सिंह की गणना की जाती है।


गुरु गोविन्द सिंह का जन्म उस समय हुआ जब भारत में मुगलों का शासन था। मुगल शासकों की कार्यनीति एवं समाज के प्रति अपनाए गए व्यवहार से जनता में असंतोष बढ़ रहा था। गुरु तेग बहादुर के पुत्र तथा उत्तराधिकारी गुरु गोविन्द सिंह ने सिख-आन्दोलन को नई दिशा दी। जनता पर हो रहे क्रूर अत्याचार को देखकर गोविन्द सिंह ने बाल्यकाल में ही अनुभव किया की आतंक तथा भ्रष्ट शासन से निबटने के लिए समाज को संगठित होना चाहिए।


उनकी लड़ाई प्रमुख रूप से तत्कालीन शासन से थी न कि इस्लाम धर्म से। इसका स्पष्ट प्रमाण इस बात से मिलता है कि इन्होंने अपनी सेवा में कई पठानों को लगा रखा था और इस लड़ाई में उन्हें पीर बुधू शाह का सहयोग प्राप्त था। मुगलों के विरुद्ध लड़ाई में सईद बेग और मेमू खाँ भी उनकी तरफ से लड़े थे। नबी खाँ और गनी खाँ ने उन्हें मुगल सेना से बचाया था। वे पंजाब में भी वैसी ही जागृति पैदा करना चाहते थे जैसी शिवाजी ने महाराष्ट्र में की थी।


गोविन्द सिंह को लगभग १० वर्ष की अवस्था में गुरु की गद्दी मिली। सिख धर्म का आरम्भ बाबा नानक ने किया था। बाबा नानक के बाद सिख धर्म मानने वालों की संख्या में वृद्धि होने लगी। अब सिखों ने अपनी आत्मरक्षा हेतु अपने आपको संगठित करना प्रारम्भ कर दिया। दसवें गुरु गोविन्द सिंह के समय सिख लोग भली – भाँति संगठित हो गए। वे सैनिकों की भाँति घुड़सवारी करते, तलवार चलाते और लड़ाई लड़ते थे।

इतना ही नहीं कुछ राज-काज भी होने लगा। अब गुरु लोग धार्मिक गुरु के साथ-साथ राजा के समान रहने लगे। इनके शिष्य इन्हें भेंट देते। इस कार्य के लिए इन्होंने स्थान-स्थान पर कुछ व्यक्ति नियुक्त कर दिए जिन्हें मसन्द कहते थे। गुरु हरगोविन्द ने जो गुरुगोविन्द सिंह के पितामह थे, सिखों को पूरा सैनिक बना दिया था। वे स्वयं सैनिक वेश में दरबार किया करते थे। उनके शिष्य तथा दरबारी उन्हें सच्चे बादशाह कहते थे।


जिस समय गोविन्द सिंह गुरु की गद्दी पर बैठे, पंजाब में सिखों की संख्या बहुत बढ़ गयी थी।।अपने गुरु से अत्यधिक प्रेम करते थे। गुरु गोविन्द सिंह शिष्यों के आग्रह पर अम्बाला के निकट आनन्दपुर नामक स्थान पर आ गये। यह उनके पिता गुरु तेग बहादुर सिंह की राजधानी थी।


गुरु गोविन्द सिंह आनन्दपुर में लगभग २० वर्षों तक रहे और यहाँ उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थों का बड़ गम्भीरता से अध्ययन किया। इसी बीच उन्होंने एक पुस्तक का संकलन और सम्पादन किया जिसे "दशम ग्रन्थ" कहते हैं। वे स्वयं एक अच्छे कवि और विचारक थे। गुरु नानक की भाँति वे भी एक ईश्वर को माना वाले थे। अन्य धर्मावलम्बियों को भी ये सन्मान देते थे और किसी अन्य धर्म का इन्होंने कभी विरोध नही किया। इनके द्वारा रचित ''चंडी चरित्र" और "चंडी का वार'' नामक पुस्तकें वीर रस के सुन्दर काव्य हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से इन्होंने अपने शिष्यों में अदम्य साहस और वीरता का संचार किया। ये अच्छे आशुकवि भी थे। उपदेश देते-देते वे कविता कहने लगते थे। इससे सुनने वालों पर गहरा प्रभाव पड़ता था।

इन्होंने एक पुस्तक 'विचित्र नाटक' भी लिखी है। इसके द्वारा उन्होंने लोगों में उत्साह भरने का कार्य किया।


पुस्तक विचित्र नाटक में उन्होंने लिखा है, "तुम हमारे पुत्र के समान हो, नया पंथ चलाओ। लोगो से कहो कि सत्य की राह पर चले और नासमझी से काम न करें।

सन् 1666 ई० में बैसाखी वाले दिन गुरु गोविन्द सिंह जी ने 'खालसा पंथ' अथवा सिख धर्म की स्थापना की।

बैसाखी वाले दिन आनन्दपुर साहिब में लोग एकत्र हुए। श्री केश गढ़ साहिब में एक दीवान लगाय गया, जहाँ हजारों मनुष्यों की भीड़ इकट्ठी थी। गुरु गोविन्द सिंह आए। उन्होंने कहा “आप सब लोग मेरे भक्त हैं। आज खालसा के लिए बलिदान की आवश्यकता है और सबसे बड़ा बलिदान मनुष्यों का ही हो सकता है। आप लोगों में जो बलिदान देने के लिए तैयार हों वे सामने आएँ।"  

सब लोगों में एकदम सन्नाद छा गया। किसी का साहस बलि चढ़ने का नहीं होता था। थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति तैयार हुआ। वह साम आया । उसे गुरु गोविन्द सिंह अन्दर ले गए। तम्बू के अन्दर तलवार के वार की तथा धड़ गिरने की आवाज आयी। इसके पश्चात वे हाथ में खड्ग लिए फिर बाहर आए। वे बोले एक बलि और चाहिए। इस प्रकार पहले से जल्दी दूसरा आदमी तैयार हो गया। उसको भी वे अन्दर ले गये और बलि दे दी। बाहर आकर तीसर बलि की माँग की। इस बार शीघ्र ही दूसरा आदमी वह अन्दर ले गए। इसके बाद गुरु गोविन्द सिंह के साथ वे पाँचों सुसज्जित वस्त्रों के साथ बाहर आये। लोगों को बड़ा अचम्भा हुआ। उन्होंने समझा कि वे गुरु आशीर्वाद से ही जीवित हो उठे। वे पाँचो व्यक्ति पंच प्यारे कहलाये क्योंकि वे मृत्यु का डर छोड़कर अपने बलि देने को तैयार हो गये।

होंने पाँच वस्तुओं को ग्रहण करना आवश्यक बताया। वे वस्तुएँ हैं - 

(१) केश, 

(२) कड़ा, 

(३) कंघा,

(४) कच्छ,

(५) कृपाण। 

ये 'पाँच ककार' कहे जाते हैं। प्रत्येक सिख इन पाँच वस्तुओं को अपने साथ रखत है। गोविन्द सिंह ने यह भी अनुभव किया कि जाति-पाँति से देश को बड़ी हानि हो रही है और संगठन यह बाधक है। इसलिए सिख धर्म में उन्होंने जाति-पाँति का भेद-भाव नहीं रखा। उन्होंने अपने शिस्य को आज्ञा दी कि 'कट्टरता छोड़ो और अपने गुरु की आज्ञा को ही सबसे बढ़कर मानो।' 

उन्होंने अपने शिष्य से जाति-सूचक शब्द को छोड़कर प्रत्येक सिख के नाम में सिंह जोड़ना आवश्यक बना दिया, जिससे वे अपनेको सिंह के समान अनुभव करें। इन सबका परिणाम यह हुआ कि सिख संगठित सैनिक बन गए। पारस पड़ोस के राजा उनसे ईर्ष्या करने लगे। आनन्दपुर के पड़ोसी राजाओं से उनका युद्ध भी हुआ, जिसमें ये विजयी रहे किन्तु आगे और भी विपत्ति खड़ी हो गयी। 

सिखों की वीरता की बात जब औरंगजेब के कानों में पड़ी तो वह इस बात से चिन्तित और भयभीत हो गया कि उसकी राजधानी दिल्ली के निकट एक नई शक्ति उभर रही है। उस समय औरंगजेब दक्षिण में था। उसने अपने सैनिकों को वहीं से आज्ञा दी कि गोविन्द सिंह पर आक्रमण किया जाय । आनन्दपुर घिर गया। बड़ी कठिनाई से गुरु गोविन्द सिंह वहाँ से कुछ साथियों के साथ बच निकले। इसके बाद लगभग छ:-सात वर्षों तक वे औरंगजेब से युद्ध करते रहे। इन्हीं लड़ाइयों में गुरु गोविन्द सिंह के दो पुत्र मारे गये और दो को सरहिन्द के सूबेदार ने दीवार में चुनवादिया।


इन सब कठिनाइयों और दुःखों में भी गुरु गोविन्द सिंह ने अपना धैर्य और साहस नहीं खोया। गुरु गोविन्द सिंह के शौर्य से भयभीत औरंगजेब ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया। किन्तु इसी बीच औरंगजेब की मृत्यु हो गई और उसके लड़कों में राज्य के लिए लड़ाई छिड़ गई। गुरु ने उसके एक लड़के बहादुरशाह का साथ दिया जो बाद में औरंगजेब का उत्तराधिकारी बना। बहादुरशाह से मिलने के लिए वे दक्षिण जा रहे थे। मार्ग में किसी शत्रु द्वारा घायल कर दिए जाने से 42 वर्ष की अवस्था में गुरु गोविन्द सिंह की मृत्यु हो गई।


अपने छोटे से जीवन काल में उन्होंने जो भी कार्य किए वे सचमुच सराहनीय है। सिख सम्प्रदाय में गुरु परम्परा की समाप्ति का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व एक समारोह में गोविन्द सिंह जी ने पाँच पैसे व एक नागोविन्दरियल 'गुरु ग्रन्थ साहिब' के आगे रखकर माथा टेका और 'गुरु ग्रन्थ 'साहिब' को गुरु पद की पदवी प्रदान की। इसके पश्चात् उन्होंने कहा कि आज के बाद कोई देहधारी व्यक्ति गुरू नहीं होगा, बल्कि 'गुरु ग्रन्थ साहिब जी' ही आज के बाद सिखों के गुरु होंगे सब "सब सिखन को हुकुम है गुरु मान्यो ग्रन्थ।"

गुरु सिंह सिखों के महान गुरु थे। उन्होंने भेद-भाव मिटाकर खालसा पंथ को संगठित किया देशवासियों में नयी स्फूर्ति एवं प्रेरणा दी। निःसंदेह वे हमारे देश के अमूल्य रत्न थे, जिन्हें हमारा देश नहीं भूल सकता।


amazing facts about tipu sultan | Tipu sultan ki jivani

May 13, 2021 0
amazing facts about tipu sultan | Tipu sultan ki jivani


            टीपू सुल्तान



टीपू सुल्तान हैदरअली का पुत्र था और इसका जन्म सन् 1753 ई० में हुआ था। इसके पिता मैसूर के शासक थे। कुछ लोग समझते हैं कि हैदरअली मैसूर का राजा था। यह बात नहीं है। हैदरअली ने अपने को कभी राजा नहीं बनाया। मैसूर के राजा की मृत्यु के बाद उसने उनके छोटे पुत्र को जिसकी अवस्था तीन-चार वर्ष की थी, राजा घोषित कर दिया और उन्हीं के नाम पर सब काम-काज करता रहा। 


उसने धीरे-धीरे मैसूर राज्य की सीमा बढ़ा ली थी। कुछ पढ़ा-लिखा न होने पर भी उसको सेना सम्बन्धी अच्छा ज्ञान था। उसका सहायक खांडेराव एक महाराष्ट्री था।

टीपू जब तीस साल का हुआ, हैदरअली की मृत्यु हुई। युद्ध तथा शासन का तब तक उसे बहुत अच्छा ज्ञान हो गया था। उस समय भारत में इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपना राज्य फैला रही थी। हैदर अली कई बार कम्पनी से लड़ा था जिसके कारण टीपू को अंग्रेजों से लड़ने के रंग-ढंग की जानकारी हो गयी थी। इस युद्ध में टीपू ने नये ढंग के आक्रमण का तरीका निकाला था।


 वह एकाएक बहुतं जोरों से बिजली की भाँति आक्रमण करता था और शत्रु के पैर उखड़ जाते थे। हैदरअली स्वयं पढ़ा-लिखा नहीं था परन्तु टीपू की शिक्षा की उसने अच्छी व्यवस्था कर दी थी। अतः टीपू शिक्षित भी था और घुड़सवारी में भी निपुण था। 


जिस समय टीपू को पिता की मृत्यु का समाचार मिला वह भारत के पश्चिम मालाबार में अंग्रेजों से लड़ रहा था। उसने लड़ाई छोड़ना ही उचित समझा। वहाँ सभी दरबारियों तथा मन्त्रियों ने इनको ही सहायता दी और टीपू मैसूर की बड़ी सेना का सेनापति बनाया गया।

इसके बाद उसे अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने का प्रबन्ध करना था। अंग्रेजों ने मराठों से सन्धि कर ली और टीपू पर आक्रमण किया। इस लड़ाई में टीपू और अंग्रेजों को पराजित किया। टीपू ने अपनी सहायता के लिए कुछ फ्रेंच सिपाही भी रखे थे जो उन दिनों भारत में थे।


 अंग्रेजों ने टीपू से सन्धि की प्रार्थना की। इस सन्धि की बातें करने के लिए अंग्रेजों की ओर से एक दल आया और टीपू से अंग्रेजों की सन्धि हो गयी किन्तु अंग्रेजों ने यह सन्धि इसलिए की थी कि हमें समय मिल जाय जिसमें हम और तैयारी कर लें और टीपू की सारी शक्ति को चूर कर डालें। टीपू को इसका ध्यान न रहा। वह  समझता था कि मैंने अंग्रेजों को हरा दिया है, मेरी शक्ति उनके बराबर तो है ही। यहीं उसने धोखा खाया। उसने शत्रु की शक्ति का अनुमान ठीक नहीं लगाया। 


फ्रेंच सैनिकों ने भी टीपू के इस विचार का समर्थन किया। इतना ही नहीं, उन लोगों ने उसे भड़काया भी था। उन लोगों का विचार था कि यदि अवसर मिले तो टीपू की सहायता से अंग्रेजों को भारत के दक्षिण से निकालकर स्वयं वहाँ राज्य करें। इन बातों से टीपू का उत्साह बढ़ गया। टीपू ने फ्रांस से कुछ सहायता पाने की आशा की, कुछ जगह पत्र भी लिखा। उसका यही अभिप्राय था कि अंग्रेजों को भारतवर्ष से निकाल दिया जाए।


अंग्रेजों को इस बात का पता लग गया और उन्होंने टीपू को समय देना उचित न समझा। उन्होंने टीपू के विरुद्ध सेना भेज दी। इस बार अंग्रेजों और टीपू के बीच कई बार घमासान लड़ाइयाँ हुई और अन्त में टीपू घिर गया। कुछ दिनों के बाद टीपू लड़ते हुए मारा गया। टीपू को विजय प्राप्त नहीं हुई, यह उसका दुर्भाग्य था। किन्तु यदि उसे सचमुच सहायता मिली होती तो अंग्रेजों का राज्य भारतवर्ष में शायद दृढ़ न हो पाता और हमारे देश का इतिहास बदल गया होता। यदि वह अंग्रेजों से ले देकर सन्धि कर लेता तो उसे कोई कठिनाई न होती किन्तु उसने ऐसा नहीं किया और इसी कारण अंग्रेज भी उसका नाश करने पर तुले हुए थे। 


टीपू ने अपने राज्य में अनेक सुधार किये थे। उस समय वहाँ ऐसी प्रथा थी कि एक स्त्री कई पुरुषों से विवाह कर सकती थी। यह प्रथा उसने बन्द कर दी और नियम बनाया कि जो ऐसा करेगा उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा। वह स्वयं शराब नहीं पीता था और उसके राज्य में शराब पीना अपराध था। उसकी पढ़ने-लिखने में रुचि थी और उसका निजी पुस्तकालय था। उन दिनों पुस्तकालय बनाना कठिन था क्योंकि छापाखाना नहीं था और हाथ से लिखी पुस्तकें ही मिलती थीं। उन पुस्तकों से पता चलता है कि साहित्य के साथ-साथ टीपू की कविता, गणित, ज्योतिष, विज्ञान तथा कला में भी रुचि थी।


टीपू का जीवन आमोद-प्रमोद में नहीं बीतता था। सबेरे से सन्ध्या तक वह परिश्रम करता था और चाहता था कि दूसरे भी इसी प्रकार राज्य का काम-काज करें। उसने तिथियाँ सूर्य-वर्षों के अनुसार चलायी थीं। युद्ध-कला पर उसने एक पुस्तक भी लिखी। उसकी स्पष्ट आज्ञा थी युद्ध के पश्चात् लूटपाट में स्त्रियों को कोई न छुए। अपनी माता का वह बहुत सम्मान करता था और सदा उनकी आज्ञा का पालन करता था।


टीपू ने अपने पिता के सम्मुख युवावस्था में लिख कर प्रतिज्ञा की थी कि मैं झूठ कभी नहीं बोलूंगा, धोखा किसी को नहीं दूंगा, चोरी नहीं करूँगा और जीवन के अन्त तक उसने इस प्रतिज्ञा का पालन किया। टीपू हिन्दू-मुस्लिम मेल-जोल का पक्षपाती था। उसकी सेना में तथा मन्त्रि मण्डल में सभी धर्मों के अनुयायी थे। हाँ, धोखा देने वालों के साथ उसका व्यवहार कठोर होता था और उन्हें वह दण्ड देता था।

टीपू, वह वीर था जिसने अपने देश को विदेशियों के चंगुल से छुड़ाने का कठिन प्रयत्न किया। उसे सफलता नहीं मिली, किन्तु उसके महान होने में कोई सन्देह नहीं है।


Monday, 10 May 2021

छत्रपति शिवाजी का गौरवशाली गाथा, शिवाजी की जीवनी

May 10, 2021 0
 छत्रपति शिवाजी का गौरवशाली गाथा, शिवाजी की जीवनी

                  छत्रपति शिवाजी


भारतीय इतिहास के महापुरुषों में शिवाजी का नाम प्रमुख है। वे जीवन भर अपने समकालीन शासकों के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।

शिवाजी का जन्म 4 मार्च सन् 1627 ई० को महाराष्ट्र के शिवनेर के किले में हुआ था। इनके पिता का नाम शाहजी और माता का नाम जीजाबाई था। शाहजी पहले अहमदनगर की सेना में सैनिक थे। वहाँ रहकर शाहजी ने बड़ी उन्नति की और वे प्रमुख सेनापति बन गये। कुछ समय बाद शाहजी ने बीजापुर के सुल्तान के यहाँ नौकरी कर ली। जब शिवाजी लगभग दस वर्ष के हुए तब उनके पिता शाहजी ने अपना दूसरा विवाह कर लिया। अब शिवाजी अपनी माता के साथ दादाजी कोणदेव के संरक्षण में पूना में रहने लगे।

जीजाबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। उन्होंने बड़ी कुशलता से शिवाजी की शिक्षा-दीक्षा का प्रबन किया। दादाजी कोणदेव की देख-रेख में शिवाजी को सैनिक शिक्षा मिली और वे घुड़सवारी, अस्त्रों-शस्त्र के प्रयोग तथा अन्य सैनिक कार्यों में शीघ्र ही निपुण हो गये। वे पढ़ना, लिखना तो अधिक नहीं सीख सके परन्तु अपनी माता से रामायण, महाभारत तथा पुराणों की कहानियों सुनकर उन्होंने हिन्दू धर्म और भारती संस्कृति का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। माता ने शिवाजी के मन में देश-प्रेम की भावना जाग्रत की।

शिवाजी को वीरों की साहसिक कहानियाँ सुनाती थीं। बचपन से ही शिवाजी के निडर व्यक्तित्व का निर्माण आरम्भ हो गया था।

शिवाजी सभी धर्मों के संतों के प्रवचन बड़ी श्रद्धा के साथ सुनते थे। सन्त रामदास को उन्होंने अपन गुरु बनाया। गुरु पर उनका पूरा विश्वास था और राजनीतिक समस्याओं के समाधान में भी वे अपने गुरु की राय लिया करते थे। दादाजी कोणदेव से शिवाजी ने शासन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त कर लिया था पर जब शिवाजी बीस वर्ष के थे तभी उनके दादा की मृत्यु हो गयी। अब शिवाजी को अपना मार्ग स्वयं बनाना था। भावल प्रदेश के साहसी नवयुवकों की सहायता से शिवाजी ने आस-पास के किलों पर अधिकार करना आरम्भ कर दिया बीजापुर के सुल्तान से उनका संघर्ष हुआ। शिवाजी ने अनेक किलों को जीत लिया और रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।

बीजापुर का सुल्तान शिवाजी को नीचा दिखाना चाहता था। उसने अपने कुशल सेनापति जफजल के को पूरी तैयारी के साथ शिवाजी को पराजित करने के लिए भेजा। अफजल खो जानता था कि युदध भूमि में  के सामने उसकी दाल नहीं गलेगी इसलिए कूटनीति से उसने शिवाजी को अपने जाल में फंसाना चाहा उसने दूत के द्वारा शिवाजी के पास संधि प्रस्ताव भेजा। उन्हें दूत की बातों से अफजल खाँ के कपटपूर्ण व्यवहार का आभास मिल गया था। अतः वे सतर्क होकर अफजल खाँ से मिलने गये। उन्होंने साहसपूर्वक स्थिति किया और हाथ में पहने हुए बधनख से अफजल खाँ का वध कर दिया।

शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से मुगल बादशाह औरंगजेब को चिन्ता हुई। उसने अपने मामा शाइस्ता खां को दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेजा और उसने शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति को नष्ट करने को कहा।

शाइस्ता खों पूना के एक महल में ठहरा था। रात के समय शिवाजी ने अपने सैनिकों के साथ शाइस्ता खाँ पर आक्रमण कर दिया। लेकिन वे अंधेरे में कमरे से भाग निकला। इस पराजय से मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को बड़ी क्षति पहुंची अब शिवाजी का दमन करने के लिए औरंगजेब ने आमेर के राजा जयसिंह को भेजा। जयसिंह नीतिशाल, दूरदर्शी योग्य और साहसी सेनानायक था। इन दोनों के मध्य दो महीने तक घमासान युद्ध अन्त में शिवाजी संधि करने के लिए विवश हो गये और उनको जयसिंह की सभी शर्तं स्वीकार करनी जब जयसिंह के साथ शिवाजी आगरा पहुंचे तब नगर के बाहर उनका स्वागत नहीं किया गया। मुगल दरवार में भी उनको यथोचित सम्मान नहीं मिला। स्वाभिमानी शिवाजी यह अपमान सहन न कर सके, वे मुगल सम्राट का अवहेलना करके दरबार से चले आये। औरंगजेब ने उनके महल के चारों ओर पहरा बैठाकर उनको कैद कर लिया। वे शिवाजी का वध करने की योजना बना रहा था। इसी समय शिवाजी ने बीमार हो जाने की घोषणा कर दी। वे ब्राह्मणों और साधु सन्तों को मिठाइयों की टोकरियाँ भिजवाने लगे। बॅहगी में रखी एक आर की टोकरी में स्वय बैठकर वे आगरा नगर से बाहर निकल गये और कुछ समय बाद अपनी राजधानी रायगढ़ पहुंच गये। शिवाजी के भाग निकलने का औरंगजेब को जीवन-भर पछतावा रहा।

शिवाजी को अपनी सैन्य शक्ति का पुन गठन करने के लिए समय की आवश्यकता थी। अत: उन्होंने मुगलों से सन्धि करने में हित समझा। दक्षिण के सूबदार राजा जयसिंह की मृत्यु हो चुकी थी और उनके स्थान पर शाहजादा मुअज्जम दक्षिण का सूबदार था। उसकी सिफारिश पर औरंगजेब ने सन्धि स्वीकार कर ली और शिवजी की राजा की उपाधि को भी मान्यता दे दी। अब शिवाजी अपने राज्य की शासन-व्यवस्था को सुदृढ़ करन लग गये।

शिवाजी बहु प्रतिभावान और सजग राजनीतिज्ञ थे। उन्हें अपने सैनिकों की क्षमता और देश की भौगोलिक स्थिति का पूर्ण ज्ञान था। इसलिए उन्होंने दुर्गा के निर्माण और छापामार युद्ध में मुगल सेनाओं की सहायता करके उनका अपना मित्र भी बनाय रखा। उनकी यह नीति उनके युग के लिए नयी थी।

यद्यपि उनका जीवन एक तूफानी दौर के बीच से गुजर रहा था पर ये अपने राज्य की शासन व्यवस्था के लिए समय निकाल लेते थे।

शिवाजी की ओर से औरगजेब का मन साफ नहीं था इसलिए सब्धि के दो वर्ष बाद ही फिर संघर्ष आरम्भ हो गया। शिवाजी ने अपने वे सब किल किरात लिया जिनको जयसिंह ने उनसे छीन लिया था।

उनकी सेना फिर मुगल राज्य में छापा मारने लगी। उन्होंने कोड़ाना के किले पर आक्रमण करके अधिकार प्राप्त कर लिया और उसका नाम सिंहगढ़ रख दिया। उनका अन्य किल्ला पर अधिकार कर लेने के बाद शिवाजी ने सूरत पर छापा मारा और बहुत सी सम्पत्ति प्राप्त की। इस प्रकार प्राप्त सम्पत्ति का कुछ भाग तो वे उदारता से अपने सैनिकों में बॉट दते थे और शेष सेना के संगठन तथा प्रजा के हित के कार्यों में खर्च करते थे ।


अब शिवाजी महाराष्ट्र के विस्तृत क्षेत्र के स्वतन्त्र शासक बन गए और सन् 1674 ई० में बड़ी धूमधाम से उनका राज्याभिषेक हुआ। उसी समय उन्होंने छत्रपति की पदवी धारण की। इस अवसर पर उन्होंने बड़ी उदारता से दीन दुःखियों को दान दिया।

राज्याभिषेक के बाद भी शिवाजी ने अपना विजय अभियान जारी रखा। बीजापुर और कर्नाटक ।

आक्रमण करके समुद्रतट के सारे प्रदेशों को अपने अधिकार में कर लिया। शिवाजी ने ही सबसे सुव्यवस्थि ढंग पहले का संगठन किया। शिवाजी महान दूरदर्शी थे और वे यह जानते थे कि भविष्य में देश को नौसेना की भी आवश्यकता होगी।

शिवाजी सभी धर्मों का समान आदर करते थे। राज्य के पदों के वितरण में भी कोई भेद-भाव नहीं रखते थे। उनके राज्य में स्त्रियों का बड़ा सम्मान किया जाता था। युद्ध में यदि शत्रु पक्ष की कोई महिला अधिकार में आ जाती तो वे उसका सम्मान करते थे और उसे उसके पति अथवा माता-पिता के पास पहुँचा देते थे। उनका राज्य धर्मनिरपेक्ष राज्य था। उनके राज्य में हर एक व्यक्ति को धार्मिक स्वतन्त्रता, अत्याचार के दमन को वे अपना कर्त्तव्य समझते थे, इसीलिए सेना संगठन को विशेष महत्व देते थे। सैनिक की सुख-सुविधा का वे विशेष ध्यान रखते थे। शिवाजी के राज्य में अपराधी को दण्ड अवश्य मिलता था जब उनका पुत्र शम्भाजी अमर्यादित व्यवहार करने लगा तो उसे भी शिवाजी के आदेश से बन्दी बना लिया था।

शिवाजी ने एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना का महान संकल्प लिया था और इसी लक्ष्य की प्राप्ति लिए वे आजीवन संघर्ष करते रहे। सच्चे अर्थों में शिवाजी एक महान राष्ट्रनिर्माता थे। उन्हीं के पदचिह्नों चलकर पेशवाओं ने भारत में मराठा शक्ति और प्रभाव का विस्तार कर शिवाजी के स्वप्न को साकार किया।


 

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